Thursday, June 11, 2020

गोरखनाथ : एक महान गुरु भक्त - दहीबडे के बदले में दी अपनी आँख


एक बार तीर्थयात्रा पर निकले गुरू शिष्य कनकगिरी नगर मे जठराग्नि शमन करने हेतु मछिन्द्र नाथ ने गोरखनाथ को नगर में अलख जगाने का आदेश दिया ! घर घर के द्वार अलख जगाने पर भी निराश हुए गोरखनाथ को एक कुलीन ब्राह्मणि ने श्राद्धरत होने से खप्पर भरकर विविध व्यंजन भिक्षा दी और गोरखनाथ सहर्ष गुरूसमक्ष अर्पण किये !

दोनों ने भोजन ग्रहण किया तत्पश्चात मछिन्द्रनाथ ने कहा - बेटा गोरख ! दहीबडे़ तो बडे़ स्वादिष्ट है यदि एक

ओर मिल जाता तो ... ! गुरूमंशा जान गोरख तुरंत उठ खडे़ हुए और खप्पर चिमटा ले नगर को प्रस्थान किया। वे ग्राम-नगर के बाहर ही आश्रय लेते थे !

एक जीर्ण शीर्ण मंदिर में वहां ठहरे थे। पुन: उसी द्वार अलख उचारा तो एक कर्कशा ब्राह्मिणी जो उस स्त्री की जेठानी थी जिसने श्राद्ध के हलवा पूरी पकौडा व दहीबडा से खप्पर भरा था,द्वार पर आई ! गोरखनाथ बडी़ विनम्रता से बोले - माताजी ! मेरे साथ मेरे गुरूदेव भी है। आपके यहां से प्राप्त भोजन हमने बडे़ प्रेम से ग्रहण किया ! अभी गुरूजी की एक-दो दहीबडे़ और खाने की इच्छा बाकी है। जिस कारण मुझे दोबारा यहां आना पडा़। आप एक-दो दहीबडा़ और देने की कृपा करें !

"मुझे तो तू ही पेटू नजर आ रहा है। तेरी ही जीभ दहीबडे़ खाने को लपलपा रही है। गुरू बेचारे को व्यर्थ ही बदनाम कर रहा है - वह बोली ! गोरखनाथ बोले - माता ! मैं कभी झूंठ नहीं बोलता !

ब्राह्मिणी ने कहा - मैं तुम जैसे ठगों से भली भांति परिचित हूं। तुम कभी किसी का भला नहीं कर सकते। गृहस्थियों से लूटकर खाना ही तुम्हारा धर्म है !

उसके कठोर वचन सुन गोरखनाथ बोले - माताश्री ! आप मेरे गुरू की इच्छा पूर्ति कर दें तो मैं आपकी हर परेशानी दूर करने की कोशिश करूंगा !

ब्राह्मणी बोली - तेरे पास रखा ही क्या है जो तू मेरी मनोकामना पूरी करेगा ! गोरखनाथ -आप एकबार कहकर तो देखें कि मैं क्या कर सकता हूं ! वो बोली - -मुझे दहीबडे़ के बदले तेरी एक आँख चाहिए। बौल देगा !

आँख कौनसी बडी़ चीज है। मैं तो गुरू इच्छा के लिए अपनी जान भी दे सकता हूँ - गोरखनाथ ने जवाब दिया !

वह बोली - मैं दहीबडा़ लाती हूं तब तक तू आँख निकालकर रख ! इतना कह जब वह मुडी़ तो गोरखनाथ ने आँख में ऊंगली डाल पुतली को जोर से झटका मारकर आँख बाहर निकाल ली और खून टपकने लगा !

वह स्त्री लौटी तो उसके होश उड़ गए । वह मन ही मन दुखी होकर दहीबडे़ देकर जाने लगी ! तो गोरख बोले- माताजी ! आँख तो लेती जाओ ! वह पश्चाताप मे भर बोली-- बेटा ! मैं तेरी आँख लेकर क्या करूंगी ? मैं तो तेरी गुरू भक्ति देखकर खुद ही दुखी हो रही हूँ। बेटा ! मुझे माफ कर दे।

धन्य है भारतभूमि जहां ऐसे महान् गुरूभक्त शिष्य हुए जो अपने गुरू के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए सदैव तत्पर रहे।

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