Wednesday, July 15, 2020

यादवों के पितामह महाराज ययाति : संपूर्ण पृथ्वी के एकछत्र राजा

रामचरितमानस में गुरु वशिष्ठजी भरतजी को समझाते हुए कहते हैं, "तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ॥"

राजा ययाति के पुत्र ने पिता को अपनी जवानी दे दी। पिता की आज्ञा पालन करने से उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ॥ आखिर कौन थे ययाति???  ययाति 'व्रजा' के गर्भ से उत्पन्न महाराज नहुष के पुत्र थे। ये भारत के पहले चकर्वर्ती सम्राट हुये जिसने अपने राज्य का विस्तार किया। इनकी बुद्धि बड़ी तीव्र थी। जब इनके पिता नहुष को अगस्त आदि ऋषियों ने इन्द्र पद से हटा दिया और अजगर बना दिया तथा इनके ज्येष्ठ भ्राता ने राज्य लेने से इन्कार कर दिया, तब ययाति राजा के पद पर बैठे। इन्होने अपने चारों छोटे भाइयों को चार दिशाओ में नियुक्त कर दिया और खुद शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और असुर सम्राट वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से विवाह करके पृथ्वी की रक्षा करने लगे।

देवयानी से दो पुत्र यदु और तुर्वसु हुए तथा शर्मिष्ठा से दुह्यु, अनु और पुरु नामक तीन पुत्र हुए।माता देवयानी के गर्भ से उत्पन्न महाराज ययाति के पुत्र यदु से यादव वंश चला। इसलिए राजा ययाति को यादवों का पितामह भी कहा जाता है।

महाराज ययाति क्षत्रिय थे तथा देवयानी ब्राह्मण पुत्री थी। यह असम्बद्ध विवाह कैसे हुआ? देवयानी और शर्मिष्ठा कौन थी?

शर्मिष्ठा दैत्यों के राजा वृषपर्वा की कन्या थी। वह अति सुंदर राजपुत्री थी। राजा को शर्मिष्ठा से विशेष स्नेह था। पुराणों के अनुसार शुक्राचार्य दैत्यों के राजगुरु एवं पुरोहित थे। देवयानी उन्ही दैत्य गुरु शुक्राचार्य की पुत्री थी तथा शर्मिष्ठा की सखी थी। रूप-लावण्य में देवयानी शर्मिष्ठा से किसी प्रकार से कम न थी। देवयानी और शर्मिष्ठा दोनों महाराज ययाति की पत्नियाँ थी।

एक दिन शर्मिष्ठा अपनी सखियों के साथ नगर के उपवन में टहल रही थी। उनके साथ गुरु पुत्री देवयानी भी थी। उस उपवन में सुंदर-सुंदर सुहावने पुष्पों से लदे हुए अनेको वृक्ष थे। उसमे एक सुंदर सरोवर भी था। सरोवर में सुंदर सुंदर मनमोहक कमल खिले हुए थे। उनपर भौरे मंडरा रहे थे।

इस सरोवर पर पहुचने पर सभी कन्याओ ने अपने अपने वस्त्र उतारकर किनारे रख दिया और आपस में एक दुसरे संग जल क्रीडा करते हुई जलविहार करने लगी। उसी समय भगवान शंकर पार्वती के साथ उधर से निकले। भगवान शंकर को आता देख सभी कन्याये लज्जावश दौड़ कर अपने अपने वस्त्र पहनने लगी। जल्दी में भूलवश  शर्मिष्ठा ने देवयानी के वस्त्र पहन लिए. इस पर देवयानी क्रोधित हो कर बोली-"हे शर्मिष्ठा! एक असुर पुत्री होकर तुमने ब्राह्मण पुत्री के वस्त्र पहनने का साहस कैसे किया?

जिन ब्राह्मणों ने अपने तपोबल से इस संसार की सृष्टि की है, बड़े-बड़े लोकपाल तथा देव इंद्र आदि जिनके चरणों की वंदना करते है, उन्ही ब्राह्मणों में श्रेष्ट हम भृगुवंशी है। मेरे वस्त्र धारण कर तूने मेरा अपमान किया है।" देवयानी के अपशब्दों को सुनकर शर्मिष्ठा तिलमिला गयी और क्रोधित होकर देवयानी को कहा-" तू भिखारिन! तूने अपने आप के क्या समझ रखा है? तुझे कुछ पता भी है?

जैसे कौए और कुत्ते हमारे दरवाजे पर रोटी के टुकड़ो के लिए ताकते रहते है उसी तरह तू अपने बाप के साथ मेरी रसोई की तरफ देखा करती है।क्या मेरे ही दिए हुए टुकडो से तेरा शरीर नहीं पला? " यह कहकर शर्मिष्ठा ने देवयानी के पहने हुए कपडे छीन कर उसे निर्वस्त्र ही उपवन के एक कुएं में ढकेलवा दिया. देवयानी को कुएं में ढकेलकर शर्मिष्ठा सखियों को लेकर घर चली आयी।

संयोगवश राजा ययाति उस समय वन में शिकार करने गए हुए थे और वे उधर से गुजर रहे थे. उन्हें बड़ी प्यास लगी थी। पानी की खोज करते हुए वे उसी कुएं के पास गए जिसमे देवयानी को गिरा दिया गया था। उस समय वह कुए में निर्वस्त्र खड़ी थी। राजा ययाति ने उसे पहनने के लिए अपना दुपट्टा दिया और दया करके अपने हाथ से उसका हाथ पकड़कर कुएं से बहार निकाल लिया। कुए से बहार निकलने पर देवयानी ने ययाति से कहा-"हे वीर, जिस हाथ को आपने पकड़ा है उसे अब कोइ दूसरा न पकडे। मेरा और आपका सम्बन्ध ईश्वरकृत है मनुष्यकृत नहीं।

निसंदेह मै बाह्मण पुत्री हूँ लेकिन मेरा पति ब्रह्मण नहीं हो सकता क्योकि वृहस्पति के पुत्र कच ने ऐसा श्राप दिया है." देवयानी के ऐसा कहने पर राजा न चाहते हुए भी देवों की प्रेरणा से उसकी बात मान गए। इसके बाद ययाति अपने घर चले गये। उधर देवयानी रोती हुई अपने पिता शुक्राचार्य के पास आई और शर्मिष्ठा ने जो कुछ किया था वह कह सुनाया। पुत्री की दशा देख कर शुक्राचार्य का मन उचाट गया। वे पुरोहिती की निंदा करते हुए तथा भिक्षा-वृति को बुरा कहते हुए अपनी बेटी देवयानी को साथ लेकर नगर से बाहर चले गए।

यह समाचार जब वृषपर्वा ने सुना तो उनके मन में शंका हुई कि गुरूजी कही शत्रुओ से मिलकर उन्हें हरवा न दे अथवा शाप न दे दें- ऐसा विचार कर वह गुरूजी के पास आये और मस्तक नवाकर क्षमा याचना की। तब शुक्राचार्य जी बोले-"हे राजन! देवयानी को मना लो, वह जो कहे उसे पूरा करो." वृषपर्वा से देवयानी बोलीं -" मै पिता की आज्ञा से जिस पति के घर जाऊं अपनी सहेलियों के साथ शर्मिष्ठा उसके यहाँ मेरी दासी बनकर रहे।

शर्मिष्ठा इस बात से बहुत दुखी हुई परन्तु यह सोच कर देवयानी की शर्त मान ली कि इससे मेरे पिता का बहुत काम सिद्ध होगा। तब शुक्राचार्य ने देवयानी का विवाह ययाति के साथ कर दिया। एक हज़ार सहेलियों सहित शर्मिष्ठा को देवयानी की दासी बनाकर उसके घर भेज दिया। समय बीतता गया देवयानी लगन के साथ पत्नी-धर्म का पालन करते हुए महाराज ययाति के साथ रहने लगी। शर्मिष्ठा सहेलियों सहित दासी की भाति देवयानी की सेवा करने लगी।

शर्मिष्ठा राजा ययाति की पत्नी कैसे बनी?

दिनों के बाद देवयानी पुत्रवती हो गई। देवयानी से यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्र हुए। देवयानी को संतान देख शर्मिष्ठा ने भी संतान प्राप्ति के उद्देश्य से राजा ययाति से एकांत में सहवास की याचना की।इस प्रकार की याचना को धर्म-संगत मानकर, शुक्राचार्य की बात याद रहने पर भी, उचित काल पर राजा ने शर्मिष्ठा से सहवास किया। इस प्रकार शर्मिष्ठा से दुह्यु, अनु और पुरु नामक तीन पुत्र हुए।जब देवयानी को ज्ञात हुआ कि शर्मिष्ठा ने मेरे पति द्वारा गर्भ धारण किया था तो वह क्रुद्ध हो कर अपने पिता शुक्राचार्य के पास चली गयी। राजा ययाति भी उसके पीछे गये।उसे वापस लाने के लिए बहुत अनुनय-विनय किया परन्तु देवयानी नही मानी।

जब शुक्राचार्य को सारा वृतांत मालुम हुआ तो क्रोधित होकर बोले-" हे स्त्री लोलुप! तू झूठा है। जा मनुष्यों को कुरूप करने वाला तेरे शरीर में बुढ़ापा आ जाये।" तब ययाति जी बोले-"हे गुरु श्रेष्ठ मेरा मन आपकी पुत्री के साथ सहवास करने से अभी तृप्त नहीं हुआ है। इस शाप से आपकी पुत्री का भी अनिष्ट होगा" मेरी पुत्री का अनिष्ट होगा ऐसा सोचकर, बुढ़ापा दूर करने का उपाय बताते हुए, शुक्राचार्य जी बोले -" जाओ! यदि कोई प्रसन्नता से तेरे बुढ़ापे को लेकर अपनी जवानी दे दे तो उससे अपना बुढ़ापा बदल लो।"

यह व्यवस्था पाकर राजा ययाति अपने राज महल वापस आए। बुढ़ापा बदलने के उद्देश्य से वे अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु से बोले-'बेटा तुम अपनी तरुणावस्था मुझे दे दो तथा अपने नाना द्वारा शापित मेरा बुढ़ापा स्वीकार कर लो।" तब यदु जी बोले-" पिताजी असमय आपकी वृद्धावस्था को मै लेना नहीं चाहता क्योकि बिना भोग मनुष्य की तृष्णा नहीं मिटती है।" इसी तरह तुर्वसु,, दुह्यु और अनु ने भी अपनी जवानी देने से इन्कार कर दिया|

तब राजा ययाति ने अपने कनिष्ठ पुत्र पुरु से कहा-"हे पुत्र! तुम अपने बड़े भाइयो की तरह मुझे निराश मत करना।" पुरु ने अपने पिता की इच्छा के अनुसार उनका बुढ़ापा लेकर अपनी जवनी दे दिया। पुत्र से तरुणावस्था पाकर राजा ययाति यथावत विषयों का सेवन करने लगे। इस प्रकार वे प्रजा का पालन करते हुए एक हज़ार वर्ष तक विषयों का भोग करते रहे, परन्तु भोगो से तृप्त न हो सके।

अपने पुत्र दुह्यु को दक्षिण-पूर्व की दिशा में, यदु को दक्षिण दिशा में, तुर्वसु को पश्चिम दिशा में तथा अनु को उत्तर दिशा में राजा बना दिया। पुरु को राज सिंहासन पर बिठाकर उसके सब बड़े भईयों को उसके अधीन कर स्वयम वन को चले गए।वहां जाकर उन्होंने आत्म आराधना की जिससे अल्प काल में ही परमात्मा से मिलकर मोक्ष-धाम को प्राप्त हुए। देवयानी भी सब राज नियमों से विरक्त होकर भगवान् का भजन करते हुए परमात्मा में लीन हो गयी।

महाराज ययाति के पांच पुत्र हुए जिसमे यदु और तुर्वसु महारानी देवयानी के गर्भ से तथा दुह्यु,, अनु और पुरु शर्मिष्ठा के गर्भ से उत्पन्न हुए। राजा ययाति का पूरी धरती पर एकछत्र राज था। वह सातों द्वीपों के राजा थे. ऐसे में उन्होंने दक्षिण-पूर्व दिशा का राज्य अपने पुत्र द्रुह्यु, दक्षिण का यदु, पश्चिम का तुर्वसू और उत्तर का राज्य अनु को सौंप दिया।

इसी के साथ ययाति ने अपने सबसे श्रेष्ठ पुत्र यदु को राजा घोषित कर दिया. उन्होंने सभी भाईयों को राजा यदु के अधीन कर खुद वन की ओर निकल पड़े।

माना जाता है कि ययाति के इन 5 पुत्रों के वंश से ही अखंड भारत में रहने वाली विभिन्न जातियां बनी हैं।साथ ही वेदों में पंचनंद कहलाने वाले इन पांचों पुत्रों का आज से लगभग 10 हजार साल पहले पूरी पृथ्वी पर राज था। यदु के यदु या यादव, तुर्वसु के यवन, द्रुहु के भोज, अनु के मलेच्छ और पुरु के पौरव राजवंश ने पूरे विश्व पर  शासन किया था।

ययाति से यदु उत्पन्न हुए। यदु से यादव वंश चला| यादव वंश में यदु की कई पीढ़ियों के बाद भगवान् श्री कृष्ण, माता देवकी के गर्भ से मानव रूप में अवतरित हुए।


No comments:

Post a Comment

Popular Posts

Newsletter