Tuesday, August 25, 2020

जाने : कैसे रावण की पत्नी मंदोदरी के गर्भ से हुआ सीता जन्म ?

एक बार दण्डकारण्य मे गृतस्मद नामक ब्राह्मण ऋषि माँ लक्ष्मी जी को अपनी पुत्री रूप मे पाने के लिए हर दिन एक कलश में कुशा यानि कुश से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूदें डालते थे। एक दिन उसकी अनुपस्थिति मे लंका का राजा रावण वहां आ पहुंचा और ऋषियों मार पीटकर उनका रक्त उसी कलश मे एकत्र कर लंका ले गया. कलश को उसने अपनी पत्नी महारानी मंदोदरी को दे दिया-और यह कहा कि यह तीक्ष्ण विष है, इसे सावधानी से रखना।

और एक दिन रावण अकेले ही विहार करने चला गया, रावण की इस उपेक्षा से दुखी होकर मंदोदरी ने आत्महत्या की इच्छा से, जहर समझकर उस कलश में भरा वह रक्त पी लिया । कुछ दिनों बाद महारानी मंदोदरी गर्भवती हो गई, उन्होने सोचा कि मेरे पति मेरे पास नहीं है. ऐसे में जब उन्हें इस बात का पता चलेगा, तो वह क्या सोचेंगे ! और रावण के वापस आते ही महारानी मंदोदरी ने पुष्पक विमान से भ्रमण करने की इच्छा जताई और वो रावण के साथ पुष्पक विमान पर सवार हो बाते करते हुऐ कुरुक्षेत्र आ पहुंचे।

तभी महारानी मंदोदरी ने रावण से पुछा - स्वामी सुना है- कि आपके गर्जने(दहाड़ने) से स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं और अगर ये सत्य है तो मुझे वो गर्जना सुननी है, और अपनी प्रशंसा सुन रावण चित्कार भरी अट्टाहस के साथ गर्जा- और उस गर्जन भरी आवाज से वही हुआ जो महारानी मंदोदरी चाहती थी , उनका भी गर्भ खिसक गया और नीचे धरती पर बह रही नदी मे स्नान का बहाना कर मंदोदरी ने धरती पर उतरने की इच्छा जताई ,और पुष्पक विमान मिथिला (जनकपुरी) के पास उतरा और महारानी मंदोदरी ने गर्भ को निकालकर वहाँ पर रखे एक घड़े मे रख भूमि में गाड़ दिया और घास-फूस और लकड़ियों से ढक दिया. इसके बाद नदी में स्नान किया और रावण के साथ पुष्पक विमान से लंका लौट गई ।

'' हरि की लीला हरि ही जानै ''

और वाल्मिकी रामायण के अनुसार एक बार मिथिला में पड़े भयंकर सूखे से राजा जनक बेहद परेशान हो गऐ , और इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए उन्हें ऋषियों ने यज्ञ करने और धरती पर हल चलाने का सुझाव दिया।

और ऋषियों के सुझाव पर राजा जनक ने यज्ञ करवाया और उसके बाद राजा जनक अपनी पत्नी महारानी सुनैयना के साथ धरती को हल से जोतने लगे. तभी उनका हल धरती में गड़े उस घड़े से टकराया और तभी बच्चे के रोने की आवाज सैनिको ने देखा कि मिट्टी में लिपटी हुई एक सुंदर कन्या और महारानी की ममता जाग उठी ,क्योकि राजा जनक की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उस कन्या को हाथों में लेकर उन्हें पिता प्रेम की अनुभूति हुई ,राजा जनक और महारानी सुनैयना ने उस कन्या को सीता नाम दिया और उसे अपनी पुत्री के रूप में अपना लिया ।

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