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कौन था टीपू सुल्तान : स्वतंत्रता सेनानी या फिर दक्षिण का औरंगजेब ?

टीपू सुल्तान का पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान शाहाब  था। ये नाम उनके पिता हैदर अली ने रखा था। 15 साल की उम्र से टीपू ने अपने पिता के साथ जंग में हिस्सा लेने की शुरुआत कर दी थी। हैदर अली ने अपने बेटे टीपू को बहुत मजबूत बनाया और उसे हर तरह की शिक्षा दी। टीपू अपने आसपास की चीजों का इस्लामीकरण चाहता था। उसने बहुत सी जगहों का नाम बदलकर मुस्लिम नामों पर रखा। गद्दी पर बैठते ही टीपू ने मैसूर को मुस्लिम राज्य घोषित कर दिया। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद सभी जगहों के नाम फिर से पुराने रख दिए गए। 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों के अधिकारी लोगन ने टीपू पर आरोप लगाते हुए लिखा कि उसने महिलाओं को भी नहीं बख्शा था। पुरुषों के साथ महिलाओं को भी फांसी पर लटका कर मार दिया जाता था। इतनी ही नहीं टीपू उनके बच्चों को उन्हीं की गर्दन में लटका दिया जाता था। लोगन की किताब 'मालाबार मैनुअल' में टीपू पर बड़ी संख्या में हिंदू मंदिरों और चर्च को तोड़ने का भी आरोप लगाया गया है। विलियम भी लिखते हैं कि शहर के मंदिर और चर्चों को तोड़ने के आदेश दिए गए। यही नहीं, हिंदू और ईसाई महिलाओं की शादी जबरन मुस्लिम युवकों से कराई गई। पुरुषों से मुस्लिम धर्म अपनाने को कहा गया और जिसने भी इससे इंकार किया, उसे मार डालने का आदेश दिया गया। बताते चलें कि टीपू सुल्तान को लेकर देश में माहौल कई बार गरम हो जाता है। देश की कई पार्टियां अपने-अपने विचार लेकर टीपू के मुद्दे पर कोहराम मचाते रहते है।

कुछ राजवंशों, नवाबों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उनमें से एक थे मैसूर के शासक टीपू सुल्तान। टीपू सुल्तान का एक पक्ष है कि वो बहादुर थे। लेकिन दूसरा पक्ष ये भी है कि वो अपने राज्य में हिंदुओं और ईसाईयों को लेकर असहिष्णु थे। टीपू सुल्तान की जयंती को लेकर फिर विवाद बढ़ गया है. बीजेपी टीपू सुल्तान को अत्याचारी बता रही है। BJP ने टीपू सुल्तान की तुलना बाबर और तैमूर से करते हुए कर्नाटक की कांग्रेस सरकार और राहुल गांधी पर निशाना साधा है। हिंदू संगठन दावा करते हैं कि टीपू धर्मनिरपेक्ष नहीं था बल्कि एक असहिष्णु और निरंकुश शासक था वह दक्षिण का औरंगजेब था जिसने लाखों लोगों का धर्मांतरण कराया और बड़ी संख्या में मंदिरों को गिराया। आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य में भी टीपू सुल्तान की जयंती के विरोध में टीपू को दक्षिण का औरंगजेब बताया गया है, जिसने जबरन लाखों लोगों का धर्मांतरण कराया। 19वीं सदी में ब्रिटिश गवर्मेंट के अधिकारी और लेखक विलियम लोगान ने अपनी किताब 'मालाबार मैनुअल' में लिखा है कि कैसे टीपू सुल्तान ने अपने 30,000 सैनिकों के दल के साथ कालीकट में तबाही मचाई थी। 1964 में प्रकाशित किताब 'लाइफ ऑफ टीपू सुल्तान' में कहा गया है कि सुल्तान ने मालाबार क्षेत्र में एक लाख से ज्यादा हिंदुओं और 70,000 से ज्यादा ईसाइयों को मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया।

आरएसएस के कार्यकर्ता वी नागराज ने कहा था कि 1886 में टीपू सुल्तान के पोते गुलाम मोहम्मद ने हैदर अली खान बहादुर और टीपू सुल्तान के जीवन पर एक किताब लिखी थी। यह 1886 में छपी थी और इसे दोबारा 1976 में छापा गया। इसमें उनके पोते ने बताया कि टीपू सुल्तान के इस्लाम के लिए क्या नहीं किया सांप्रदायिक दृष्टिकोण से भले ही उन पर आरोप लग रहे हैं, लेकिन टीपू सुल्तान को दुनिया का पहला मिसाइलमैन कहा जाता है। असल में टीपू और उनके पिता हैदर अली ने दक्षिण भारत में दबदबे की लड़ाई में अक्सर रॉकेट का इस्तेमाल किया। कलाम ने यह भी लिखा था कि मुझे ये लगा कि धरती के दूसरे सिरे पर युद्ध में सबसे पहले इस्तेमाल हुए रॉकेट और उनका इस्तेमाल करने वाले सुल्तान की दूरदृष्टि का जश्न मनाया जा रहा था।

वहीं कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था कि टीपू कोई स्वतंत्रता सेनानी नहीं बल्कि राजा था और उसने अपने हितों की रक्षा के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया।


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