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जानें कौन थी वेदवती? जिसका श्राप बना था रावण की मृत्यु का कारण!


रामायण की कथा असुरों के राजा रावण के विनाश के इर्द गिर्द ही घूमती है। हम सब जानते हैं कि देवी सीता ही रावण के मृत्यु का कारण बनी थीं लेकिन क्या आप यह जानते है कि यह सब पहले से ही सुनिश्चित था। जी हां, रावण का अंत श्री राम के हाथों होना पहले से ही तय था। हालांकि इसकी वजह देवी सीता बनी जो देवी वेदवती का ही पुर्नजन्म था।


वेदवती देवी लक्ष्मी का ही एक अवतार थी जिन्हें सीता जी का भी एक रूप माना जाता है। रावण के साथ जो कुछ भी घटित हुआ वह सब इन्हीं के श्राप के कारण हुआ था। चलिए जानते हैं आखिर क्यों देवी वेदवती ने रावण को श्राप दिया था जिसके कारण उसकी मृत्यु हुई।

एक कथा के अनुसार एक बार वेदवती नामक एक युवती वन में अपने ध्यान में लीन थी। वेदवती ब्रह्मऋषि कुशध्वज की पुत्री थी। कुशध्वज को बृहस्पति का पुत्र कहा जाता है।

कहते हैं अपने जन्म के कुछ समय बाद ही वेदवती को वेदों का ज्ञान हो गया था इसलिए इनका नाम वेदवती रखा गया। वेदवती एक बहुत ही सुन्दर कन्या थी जो भगवान विष्णु की बहुत बड़ी भक्त थी। जैसे जैसे वह बड़ी हुई उसकी भक्ति के साथ भगवान के लिए उसका प्रेम भी बढ़ता गया। वेदवती विष्णु जी से विवाह करना चाहती थी इसलिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए उसने कठोर तपस्या करने का निर्णय लिया।

वेदवती अपने इरादों की पक्की थी वह निर्णय कर चुकी थी कि उसे विष्णु जी से ही विवाह करना है। किन्तु उसके परिवार वालों ने उसका साथ देने से साफ़ इंकार कर दिया इसलिए विवश होकर वेदवती को अपना घर छोड़ना पड़ा और वह वन में चली गयी। बाद में उसके परिवार ने उसे अपना लिया और वापस आश्रम ले आये।

एक दिन जब वेदवती अपने ध्यान में लीन थी तब एक असुर उसके पास आया और उससे विवाह करने के लिए कहने लगा। जब वेदवती ने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया तब उस राक्षस ने उसके माता पिता का वध कर दिया जिसके बाद वेदवती आश्रम में एकदम अकेली पड़ गयी।

वेदवती की उपासना से विष्णु जी अत्यन्त प्रसन्न हुए और एक दिन वे उसके समक्ष प्रकट हुए। भगवान ने उससे इतनी कठोर तपस्या का कारण पूछा तब वेदवती ने उन्हें बताया कि वह उन्हें पति के रूप में प्राप्त करना चाहती है। हालांकि विष्णु जी ने उसे बताया कि इस जन्म में यह मुमकिन नहीं है लेकिन अगले जन्म में वह ज़रूर उनकी अर्धांगिनी बनेंगी।

वेदवती ने विष्णु जी से विवाह करने के लिए समस्त संसार को त्याग दिया था किन्तु उसकी इच्छा पूरी न होने पर भी भगवान के प्रति उसकी श्रद्धा कम नहीं हुई और वह लगातार उनकी आराधना करती रही।


एक दिन जब वेदवती एकांत में अपनी तपस्या में मग्न थी तभी उस समय का सबसे शक्तिशाली और खतरनाक असुर रावण वहां से गुज़र रहा था। जब उसकी दृष्टि वेदवती पर पड़ी तो वह उसकी सुंदरता को देख सम्मोहित हो गया।


रावण ने वेदवती से विवाह की इच्छा जताई। जब उसने विवाह के लिए मना कर दिया तब रावण वेदवती के केश पकड़ कर उसे घसीटता हुआ ले जाने लगा। इस बात से क्रोधित होकर वेदवती ने अपने केश काट दिए साथ ही उसकी पवित्रता को भंग करने की कोशिश करने पर उसने रावण को श्राप दिया कि एक दिन वह उसकी मृत्यु कारण बनेगी। बाद में स्वयं को रावण से बचाने के लिए वेदवती ने अग्नि में कूद कर खुद को भस्म कर लिया।


चूंकि वेदवती का श्राप खाली नहीं जा सकता था इसलिए उसने अपना अगला जन्म मिथिला नरेश राजा जनक की पुत्री देवी सीता के रूप में लिया। जैसा कि विष्णु जी ने वेदवती को वचन दिया था कि अगले जन्म में वे उसके पति बनेंगे इसलिए देवी सीता का विवाह विष्णु जी के सातवें अवतार श्री राम के साथ हुआ। जब रावण ने छल से सीता जी का अपहरण किया था तब श्री राम ने उसका वध करके अपनी पत्नी को छुड़ाया था। इस प्रकार वेदवती के श्राप के अनुसार देवी सीता के रूप में वह खुद रावण के विनाश का कारण बनीं।



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